Jodhpur News

जोधपुर में एक बार फिर से 26 साल पुराना दौर:पानी के लिए इंतजार और लाइनें, टैंकर आते ही टूट पड़ते हैं

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इंदिरा गांधी नहर के क्लोजर के कारण जोधपुर में उपजे पेयजल संकट ने पुराने दौर की यादें तजा कर दी है। 26 वर्ष से लिफ्ट नहर के जरिये हिमालय का पानी पीने वाले जोधपुर के लोगों को कभी पेयजल संकट का आभास भी नहीं हुआ। अब एक बार तीन दिन में एक बार सीमित पानी ने लोगों को पानी के महत्व का अहसास करवा दिया है। शहर के कई हिस्सों में इस समय भीषण पेयजल संकट गहराया हुआ है। प्रशासन की तरफ से टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। टैंकरों के पहुंचते ही उनके चारों तरफ लोग बर्तन लेकर उमड़ रहे है। जोधपुर में ऐसा नजारा करीब 26 वर्ष पश्चात देखने को मिल रहा है।

यह थी जोधपुर की स्थिति

प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर जोधपुर पेयजल के लिए मुख्य रूप से पाली जिले में जोधपुर के महाराजा उम्मेदसिंह की ओर से वर्ष 1938 में बने जवाई बांध पर निर्भर रहता था। बारिश कम होने पर सारा दारोमदार भूजल पर निर्भर हो जाता। एक के बाद एक कर भूजल पैंदे बैठ रहा था, लेकिन लोगों की प्यास बढ़ती जा रही थी। रामपुरा-तिवरी-मथानिया से भरपूर भूजल दोहन के बाद रेल के जरिये रणसी गांव से पानी लाना पड़ा। जवाई नहर भी बहुत छोटी महसूस होने लगी। लिफ्ट नहर आने के बाद पाइप लाइन के जरिये रणसी गांव वापस पानी भेजना पड़ा।

पानी के लिए लगती थी कतारें

उस दौर में शहर के कुछेक हैंडपंप से मीठा पानी निकलता था। इन हैंडपंप का पानी पीने के लिए काम लिया जाता था। ऐसे में इन हैंडपंप पर 24 घटों लोगों की कतारें लगी रहती थी। लंबे इंतजार के बाद दो बर्तन पानी भरने का मौका मिलता था। शहर में सुबह के समय पानी के बर्तन लेकर भटकते लोगों को देखना सामान्य बात थी।

हर मकान के बाहर था हौद

जोधपुर के लोगों ने बरसों तक पेयजल संकट का सामना किया। उस समय बहुत कम दबाव से थोड़ी देर के लिए पानी आता था। ऐसे में लोगों ने अपने मकानों के बाहर गड्‌डे खुदवा रखे थे। इनके पेंदे में लगी पाइप लाइन से पानी लेकर अंदर लिया जाता था। जलापूर्ति के समय बिजली काटना नियमित दिनचर्या का हिस्सा था।

लिफ्ट नहर बनी लाइफ लाइन

जोधपुर में बढ़ते पेयजल संकट को ध्यान में रख पानी के नए विकल्प तलाशे जाने लगे। यह खोज इंदिरा गांधी नहर पर जाकर पूरी हुई। जोधपुर से 205 किलोमीटर दूर स्थित इंदिरा गांधी नहर से 217 मीटर पानी को लिफ्ट कर लाना आसान काम नहीं था। वर्ष 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिफ्ट नहर की घोषणा तो कर दी, लेकिन इसके लिए बजट जुटाना अहम चुनौती थी। बजट था 256 करोड़। उसे दौर में यह राशि बहुत बड़ी थी। आखिरकार जोड़तोड़ कर वर्ष 1989 में लिफ्ट नहर का कार्य गति पकड़ पाया। दिन रात एक करने वाले इंजीनियरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

मुश्किल था पंप की व्यवस्था करना

सबसे बड़ा संकट था पानी को लिफ्ट करने के लिए भारी-भरकम पम्पों की व्यवस्था करना। उस समय देश में सिर्फ दो कंपनियों के पास ऐसे पम्प बनाने की क्षमता थी। एक कंपनी को पम्प का ऑर्डर दिया। पम्प बनकर आने में बहुत विलम्ब हुआ। इस कारण परियोजना भी अधर में लटक गई। वर्ष 1996 में सभी आठों पम्पिंग स्टेशन तैयार होने पर जोधपुर में भरपूर पानी पहुंचना शुरू हो गया। इसी नहर की बदौलत जोधपुर के लोग पेयजल के मामले में सबसे सुरक्षित हो गए। आजादी के बाद जोधपुर के लोगों के लिए यह नहर सबसे बड़ा तोहफा थी। जोधपुर में हिमालय का पानी पहुंचना किसी जश्न से कम नहीं था। पानी को लेकर हमेशा परेशान रहने वाले लोगों के लिए इससे बड़ा अवसर कोई नहीं था। लोगों ने गाजे-बाजे के साथ हिमालय के पानी का स्वागत-सत्कार किया था।

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